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Shreya Tiwari
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 18:04 | 22/Jun/2008 | 11 Comment(s)
POLITICS...!!

किसकी  करें  ये  बात, किससे  कहें  ये  बात,
गिरते  इस  देश  को  बचाने  वाला  कौन है  ।
राजनीती    गौण   बुद्धजीवी     यहाँ     मौन,
और  जनता  बेचारी  को  तो  सुनता ही  कौन  है। 
 
पीडितों,  गरीबों,  असहाय  जनता  का  यहाँ ,
हाल  चाल  लेने  और  देने  वाला  कौन  है  ।
जाति  धर्म , क्षेत्र  और  भाषा  के  हो  गए  सभी,
आदमी  को  आदमी  बनाने  वाला  कौन  है ।  
 
राजनीती    गौण   बुद्धजीवी     यहाँ     मौन,
और  जनता  बेचारी  को  तो  सुनता ही  कौन  है। 
 
कैसा  आया   लोकतंत्रव्यवसाय  राजनीती ,
लाभ  का  बना  ये  तंत्र  सेवा  करे  कौन  है
भीड़  कहें  भेड़  कहें , जनता  को  जो  भी  कहें,
भेड़ियों   से  हमको  बचाने  वाला  कौन  है  । 
 
राजनीती    गौण   बुद्धजीवी     यहाँ     मौन,
और  जनता  बेचारी  को  तो  सुनता ही  कौन  है। 
 
जोड़े  तोडे  गठजोड , राजनीती  है  विचित्र  मोड़,
सीधे  रास्ते   पे   इन्हें  लाने   वाला  कौन  है
डरपोक  बुद्धजीवी  लिपटा   है  स्वार्थ  में  तो ,
कीचड  में  कमल  खिलाने  वाला  कौन  है । 
 
राजनीती    गौण   बुद्धजीवी     यहाँ     मौन,
और  जनता  बेचारी  को  तो  सुनता ही  कौन  है। 
 
गाँधी  और  नेहरू  का  नाम  लेते  भ्रष्टाचारी ,
गुमराहियों  से  अब  बचाने  वाला  कौन  है
रावणों के वंशज  और  जयचंदों  के  लाल  है  ये,
इनसे  निजात  भी  दिलाने  वाला  कौन  है । 

किसकी  करें  ये  बात, किससे  कहें  ये  बात,
गिरते  इस  देश  को  बचाने  वाला  कौन है  ।
राजनीती    गौण   बुद्धजीवी     यहाँ     मौन,
और  जनता  बेचारी  को  तो  सुनता ही  कौन  है।  
 
----------श्रेय तिवारी , मुंबई

Permalink 
 20:05 | 17/Jun/2008 | 8 Comment(s)
Struggle & Success....!!

मेरे प्यारे दोस्तो ,
ये कविता मैंने उन लोगो के लिए लिखी है , जो जरा सी परेशानियों से बहुत घबरा जाते है या हतोत्साहित हो जाते है , ये कविता मैंने तब लिखी थी जब मैं मुम्बई मे संघर्ष कर रहा था । मुझे वो दिन याद आ जाते है और वो संघर्ष सच मे मृत्यु के समान ही था । पर संघर्ष कि जलन को जो लोग झेलते हुए आगे बढ़ते है , और प्रभु से कहते है , " कि आप अपना काम कीजिये, और मैं अपना काम करता रहूंगा " यकीं मानिये प्रभु भी ऐसे लोगों से परेशान होकर हार मान लेते है , और ऐसे लोग को ही सफलता मिलती है । ऐसे लोग काल की भी दिशा बदल देते है , और एक सार्वभौमिक सत्य ये भी है , जिस पर मेरा अटूट विश्वास है , कि प्रभु उसी को ज्यादा कष्ट देते है , जिससे वो ज्यादा प्यार करते है ।

 

 

मृत्यु से लड़ने चला,
तो ज़िंदगी से क्यों डरु मैं...
अश्रु पीकर जी रहा ,
संघर्ष से फिर क्यों डरु मैं ....
 
चल रहा एकल निरंतर,
कंटकों मे पग पड़े है ......
आहटे लगती भयंकर,
राह मे शोले पड़े है .....
 
तीक्ष्ण है उनकी ज़लन,
वो ज़लन ही तो काम की है ...
घट न पाए, यदि लगन ,
तो ज़िंदगी आराम की है .....
 
कष्टमय हो ज़िंदगी ,
तो प्रभु परीक्षा ले रहे...
हम करें बस बन्दिगी ,
दुःख पी रहे , प्रभु दे रहे ....
 
प्यार करते प्रभु उसी को ,
कष्ट मे जो जी रहा हो ....
मुस्कुरा कर जीना सीखो,
दुःख रहे या सुख रहा हो...
 
है प्रतीक्षित वो समय ,
जो चिर - प्रतीक्षित भी नही है....
हो चलेगी तब प्रलय,
क्या ये सुनिश्चित सी नही है ....
 
हर समय सुख को मचलना,
भी तो केवल भ्रांति है ......
काल के रुख को बदलना ,
ही प्रलय की भांति है .......
 
Shreya Tiwari
Mumbai

Permalink 
 21:42 | 16/Jun/2008 | 7 Comment(s)
Reg Comments..!!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Dear Friends,

 

Few days back my blog “Oh Mother” had been uploaded at rediff homepage. I received very good response through e-mails & comments. A million thanks to my friends and iLanders.

 

Today I have few questions in my mind and I would like to ask these questions to you.

Some good friends of mine asked me “what I did? Did I help that lady?” when I saw that poor lady nearby the airport.

 

Few of them wrote “I write like a politician”. One friend asked me, when it was 5 degree C temperature in Delhi? Could you please answer me following questions?

 

  • What is a poem? Isn’t it a way of expressing the feelings?
  • Can’t I write for myself? I took a decision for myself.
  • Should I disclose it in my poem “How did I help, and what I did?”
  • Should I disclose my donation in public? Than what is “Gupt Daan”?
  • May be I am wrong…the temperature of Delhi was not 5 degree C that day, But is it not the condition of our country, haven’t you seen this anywhere?
  • While helping/serving poor & others, couldn’t I ask to general public to do the same?
  • Shouldn’t I open my mouth after seeing such kind of poverty in my country?
  • Isn’t a responsibility of each citizen?

 

My friends sometimes I feel….I should not write all these things in my poems or I should stop writing poems. I should serve my country without saying or expressing a single word. “Yahan par logo ki aatma ko jhakjhorne wala sabse bada murkh hai”. Log usi ko updesh dena shuru kar dete hai.

 

Follow a simple word “love”. When you love people, you can see a picture of GOD in every face provided your love is pure and not for your own benefit. And if you can see GOD in every face, you can never ignore them. This is universal fact.

 

मेरा  कहना  यह  है  ‘ कि  जब  आप  इस  धरती  के  हर  जीव से  सच्चा  प्यार  करोगे  आपको  प्रभु  हर  जगह , हर  चेहरे  मे दिखायी  देने  लगेंगे , और  तब आप  प्रभु  की  सेवा  करना  अवश्य  चाहेंगे,  और  किसी  भी  जरूरतमंद  की सहायता अवश्य ही करेंगेये  मेरा  मानना  है , मे  किसी  को  कुछ  करने  के  लिए  उपदेश  नही  दे  रहा .
 
जितना  प्यार  आप  अपनी  प्रेमिका से  करते  है  (लोग  अपनी   प्रेमिका  को  उसकी  धड़कनों   से  पहचानते   है , उसके  बोलने  के  ढंग  से  पहचानते  है  कि  उसको  परेशानी  क्या  है , फ़ोन  पर  बात  करते  है  और  सारी  फीलिंग्स  को  समझते  है ) वही  प्यार  हमको  इस  धरती  के  समस्त  जीवो  से  करना  है ….तभी  हमारा  देश  प्रगति  की  तरफ़  जाएगामेरे  एक  गीत   की   दो  पंक्तियाँ  यहाँ  पर  बोलूँगा  .........,
 
वो  हर जीवन   को   दे  दूंगा  , जो  प्यार  सिर्फ़  “उसकोथा  दिया ..!
मुझको  पछतावा  होता  है , क्यो  मैंने  उसको  प्यार  किया …!!

--------श्रेय तिवारी , मुम्बई

Permalink 
 09:23 | 1/Jun/2008 | 13 Comment(s)
My Loving Mother....!!

दोस्तो, ये एक छंद है, जो कि मैंने 'माँ' को समर्पित किया है , छंद को पढने का तरीका आम कविताओं से थोड़ा अलग होता है छंद रा , ज , भा , ग .... रा , ज , भा , ग के तरीके से पढ़ा जाता है , सच तो ये है कि छंद कवि के मुख से सुनने मे ही सुंदर लगता है । पर मुझे ये पता है कि आप लोग विद्वान और हिन्दी साहित्य के जानकार है ,और आप अवश्य ही मेरी रचना पर टिपण्णी देंगे ।

माँ मेरी तू है महान देवी देवता समान ,
तेरे पग की धूल मैं ललाट से लगाऊंगा ।
तेरे प्यार की पवित्रता है गंगा के समान ,
जिंदगी भी कम रहेगी मोल जो चुकाऊंगा !

1- जन्म देती हँसके सारी पीड़ाये सहन करे ,
है ख़ाक मेरी ज़िंदगी जो उसको मैं दुखाऊंगा ।
ठंड बाँट ली थी मेरी , छाती से लगा बदन ,
मैं आज तेरी आरजू को पूरा कर दिखाऊंगा ।

तेरे प्यार की पवित्रता है गंगा के समान ,
जिंदगी भी कम रहेगी मोल जो चुकाऊंगा !

2- तू न सोई रातभर सुलाया मुझको थपकी मार ,
तेरी लोरी और कहानी भूल मैं न पाउँगा ।
मुझको जब भी कष्ट हुआ तू भी रोई बार बार ,
आज तेरे सारे दुःख मैं हस के झेल जाऊंगा ।

तेरे प्यार की पवित्रता है गंगा के समान ,
जिंदगी भी कम रहेगी मोल जो चुकाऊंगा !

(इन चार पंक्तियों को ध्यान से पढिये, मैंने यहाँ "उपमा" शब्द को दो बार किस तरह प्रयुक्त किया है )


3- माँ तेरी विशेषताएं गिन न पाऊं मैं कभी ,
और उपमा(compare) मैं तेरी किसी से आज कर न पाऊंगा,
माँ तो माँ है सर्वदा , उप -माँ न होती है कभी ,
उप -माँ हुई तो कैसे तेरा लाल मैं कहाऊंगा ।

तेरे प्यार की पवित्रता है गंगा के समान ,
जिंदगी भी कम रहेगी मोल जो चुकाऊंगा !

4- ऐ मेरे प्रभु तू देना माँ के गम सभी मुझे ,
मैं अपने सुख से माँ की झोलियों को भरता जाऊंगा ।
और थक जो जाऊँ मैं कभी माँ अंक (गोदी) मे लेना मुझे ,
हर जन्म - जन्म माँ तेरी ही कोख मे समाऊंगा ।

माँ मेरी तू है महान देवी देवता समान ,
तेरे पग की धूल मैं ललाट से लगाऊंगा ।
तेरे प्यार की पवित्रता है गंगा के समान ,
जिंदगी भी कम रहेगी मोल जो चुकाऊंगा !

--------------श्रेय तिवारी , मुम्बई

Permalink 
 10:23 | 30/May/2008 | 12 Comment(s)
An Appeal

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

My dear friends/iLanders,

 

 

I thank you all for showing the amount of love and respect for my poetry. Whenever I read comments, you may not believe, I start crying.

 

Believe you me, whatever I write, it just because of you my friends, you appreciate my feelings and I write better.

 

I have a dream and it’ll happen…. I want to serve people in any manner. And I am doing. My friends don’t think like “when we’ll become rich than we’ll help” whatever you have; please try to manage with that. We’ll never have satisfaction in our mind. As I write some lines in my poetry….

 

मैं नही पर्याप्त इस जग को सहारा दे सकूं ........,
पर मैं करूँ उतना , मेरी औकात से मैं कर सकूं... ! !

 

I hate those people who always show mercy. And they think they have done their work…. no my country doesn’t want any kind of mercy or sympathy, whatever we do for our family members; we should do the same for our people.

 

किस किस से मैं करूँ निवेदन ,
दया नही , तन मन धन से सहयोग करे ।
प्रभु मुझे सिखा दो धन अर्जन ,
जिसका निर्धन उपयोग करें ॥

 

So start to do something, please avoid donate money to any kind of charity trust or temples, rather than this you can take responsibility to teach a poor child, or you can adopt a baby and take care as your blood.

 

My friends GOD is not in temples, but GOD is there in the heart of poor children/people. And if you are not able to do all this…than go to any hospital and serve/help some patients, their blessings will help you in your life.

 

I am not any GURU or Teacher, but these are my feelings and I write my feelings for you people “Meri Kavita yadi ek bhi aadmi ki soch badalti hai, mai samjhunga ki mera kavita likhna safal ho gaya”. 

 

 

Thanks,

 

Your’s

 

Shreya Tiwari

(Branch Head)

 

Compare Infobase Limited

218, Mahender Chambers

Opp. Dukes Factory, Chembur

Mumbai- 71, Maharashtra

 

 

Permalink 
 16:51 | 26/May/2008 | 16 Comment(s)
Bharat Ka Bachpan !!

मैंने ये द्रश्य मुम्बई के एक उपनगरीय स्टेशन पर देखा था , और उसी दिन मैंने ये रचना लिखी थी ।

क्यों मेरे भारत का वासी करुण कराहें लेता है ,
यहाँ का बचपन , बचपन मे ही अन्तिम सांसे लेता है ।

स्टेशन पर खड़ा प्रतीक्षा करता था मैं गाड़ी की,
“पोलिश ” की आवाज़ सुनी जब दस वर्षीय अनाडी की ।
हाथ मे था गन्दा थैला , और थामी थी घर की कमान ,
कपडे थे कुछ फटे हुए , पर आंखों मे था स्वाभिमान !!

कहता पोलिश दो रुपया , करवाले बाबू, क्या कर दूँ ?
दो रुपया मे तेरे जूते शीशे जैसे चमका दूँ ।
सुबह का टाइम है बाबू कोई बोनी मेरी करवा दे ,
क्रीम लगाकर चमका दूंगा , दो रुपया मे करवा ले ।

नहीं करानी दूर हटो , था उत्तर हर बाबूजी का ,
पर ठानी थी ज़िद उसने वो बच्चा भी बातूनी था .
झिटक रहे थे लोग उसे , पर उसमे था विश्वास बड़ा ,
हर व्यक्ति से करे प्रार्थना , हो करके नजदीक खड़ा !

तभी एक बाबूजी बोले , चल मेरे जूते कर दे !
ट्रेन का आने का टाइम है , झट से चमका कर दे दे।
बच्चे का मुख चमक उठा , सोचा मेरी बोहनी होगी ,
सोचे चालीस रूपये को अब बीस मुझे करनी होगी ।
(उसने पूरे दिन के लिए ४० रुपये कमाने का लक्ष्य बनाया है )

जैसे ही जूते चमका , बाबू के पांवों मे डाले ,
ट्रेन खड़ी थी बाबूजी तो ट्रेन के अन्दर को भागे ।
गाड़ी मे से बोले छुट्टे आज नही है पास मेरे ,
कातर नैना बच्चे के थे देख रहे थे आस भरे ।

(अब देखिये मैंने उस आदमी को क्या बोला)

अरे भले मानुष ट्रेनों मे पाँच मिनट का अन्तर है ,
भारत के इंसानों का तो दिल भी बड़ा समुन्दर है ।
दो रूपया बच्चे के मारे , दो रूपया औकात तेरी ,
बच्चा बोले अभिशापों मे लेता जा सौगात मेरी ।

(अब बच्चे के मन के भाव देखिये । मैंने पूरी कविता की जान इन दो पंक्तियों मे डालने की कोशिश की है )

बच्चा सोचे चालीस मे से दो रुपया है दान किए ,
अड़तीस तो फिर भी मेरे है प्रभु ने जब दो हाथ दिए ।

By-
Shreya Tiwari

(Branch Head)

Compare Infobase Limited

218, Mahender Chambers, Opp. Dukes Factory

Chembur, Mumbai-71, Maharashtra


 

Permalink 
 14:34 | 25/May/2008 | 9 Comment(s)
My College Days !!

कैसे भूलूं मैं तुझको सदा के लिए ,
मेरे जीवन मे जिसने ज़लाये दिए ।

१- मुझको याद आते है , मेरे कॉलेज के दिन,
हम तो रहते ना थे , एक दूजे के बिन।
होके एक पल जुदा , हम तड़प जाते थे ,
एक पल मे ही आंसू निकल आते थे ।

याद कर उन पलों को ही हम तो जिये ,
कैसे भूलूं मैं तुझको सदा के लिए ,
मेरे जीवन मे जिसने ज़लाये दिए ।

२- झूठे से हाथ देखा था मैंने यूं ही ,
तेरी गोरी कलाई थी थामी यूं ही।
एक से एक थी हंसीं तेरी हर एक अदा,
सोचता था तू मेरी रहेगी सदा ।

फ़िर कयों इतने सितम तूने हम पर किए ,
कैसे भूलूं मैं तुझको सदा के लिए ,
मेरे जीवन मे जिसने ज़लाये दिए ।

३- प्यार दिल का है सौदा ना दौलत का है ,
यूं ही बन जाता रिश्ता मोहब्बत का है।
तुम हो धनवान, दिल मेरा अनजान था,
वो तो दिल पर तुम्हारे मेहरबान था ।

ले लो सुख मेरे, दुःख दे दो मुझको प्रिये
कैसे भूलूं मैं तुझको सदा के लिए ,
मेरे जीवन मे जिसने ज़लाये दिए ।


--श्रेय तिवारी (ब्रांच हेड)
कम्पेअर इंफोबेस लिमिटेड
218, महेंदर चेम्बर्स, ड्यूक फैक्ट्री के सामने
चेम्बूर, मुम्बई, 71 महाराष्ट्र

Permalink 
 10:00 | 23/May/2008 | 10 Comment(s)